सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

दुल्हन जब किसी घर की दहलीज में प्रवेश करती है...

याद रखिए शादी के बाद लड़कियों को अपना पीहर छोड़कर ससुराल में रचना बसना होता है, सो लड़कों से ज्यादा जिंदगी उनकी बदलती है।

दोस्तों, ब्लॉगवाणी में 
आप सभी का स्वागत है। मैं हूं आपकी दोस्त शालू वर्मा। दोस्तों, शादी विवाह का सीजन है, रस्मों रिवाजों का महीना है, तो आइए आज बात कर लेते हैं दुल्हन की। उस दुल्हन की जो पूरे आयोजन की धुरी होती है। उस दुल्हन की जिसकी तस्वीर दीप की लौ से मिलती-जुलती है। जैसे मंदिर में दीप रखा जाता है, वैसे ही घर में दुल्हन आती है। मंदिर सजा हो तो दीप से रोनक दोगुनी हो जाती है‌।
वाकई हैरानी की बात है लेकिन सच है शादी का वास्ता केवल दुल्हन से ही जोड़ कर देखा जाता है। शादी केवल एक आयोजन है जिसमें ढेर सारे लोग शामिल होते हैं दुल्हन की अपनी रीत होती है बहुत सारे कार्यक्रम, रश्में और धूम होती है, लेकिन जिनमें दुल्हन शामिल हो। दिलचस्प केवल उन्हें ही माना जाता है या यूं कहें कि जिक्र केवल उन्हीं का होता है। जिक्र होता भी केवल दुल्हन का ही है, दूल्हे को लड़का कहकर बुलाया जाता है और लड़के का व्यक्तित्व बहुत हद तक उसकी नौकरी से और कुछ हद तक उसके रूप से आंक लिया जाता है। लेकिन दुल्हन का रूप, उसका निखार, उसकी सज धज यहां तक की मेहंदी का रंग तक गौर से देखा जाता है, मानो कुछ और देखने समझने लायक ही न हो उस वक्त।

दोस्तों, एक दुल्हन जब किसी घर की दहलीज में प्रवेश करती है तो इसे शुरुआत मानना चाहिए अपेक्षाओं और जिम्मेदारियों की। घर परिवार के लिए दुल्हन जैसे उस दिन केंद्र में होती है वैसे ही शादी के बाद का साल सवा साल उसी के नाम रहता है। हर त्यौहार पर पहले उसकी बात होती है फिर रस्मो की। एक लड़की के लिए इतनी तवज्जो को सही ढंग से संभाल पाने की तैयारी करना दरअसल शादी के बदलाव की पहली तैयारी मानी जा सकती है। फिर रिश्तो की सार संभाल तो जिंदगी भर की बात है, लेकिन शुरुआती दौर में जब सब दुल्हन को अहमियत दे रहे हो तब दूसरों को साथ लेकर चलना और सब तरफ से मिल रही तवज्जो के सही मायने समझ कर अपने फर्ज निभाना नई दुल्हन को मिसाल बना सकता है। याद करें तो हर परिवार में ऐसी एक दो दुल्हनें तो गिनी ही जा सकती हैं ‌,जिन्होंने घर में कदम रखते ही सबका दिल जीत लिया हो... लेकिन सवाल बनता है कि ऐसी बेमिसाल दुल्हनों की 1-2 पर ही गिनती क्यों रुक जाती है। और इसका जवाब है कि दिल जीत लेना तब आसान हो जाता है जब दिल जीते जाने को तैयार हो। दुल्हन के आने से पहले ज्यों घर का हर कोना चमकाया जाता है, वही संदेश दिलों की दरों दीवारों के लिए भी है। जरा गौर करिए कि सूने मकान में दीप केवल रस्म के तौर पर रखा जाता है, उसकी पूरी रौनक के लिए कुछ तैयारी तो देवस्थल पर भी करनी होती है।


दोस्तों, विवाह महज एक रस्म नहीं.. हमारी जिंदगी का अहम पड़ाव होता है। इस पड़ाव पर ना केवल दूल्हे- दुल्हन को एक दूसरे को समझना होता है बल्कि दोनों परिवारों को भी रिश्तों की डोर मजबूती से थामनी होती है। याद रखिए शादी के बाद लड़कियों को अपना पीहर छोड़कर ससुराल में रचना बसना होता है, सो लड़कों से ज्यादा जिंदगी उनकी बदलती है। इसलिए कई तरह के बदलाव लड़कियों को अपनी दिनचर्या में करने पड़ जाते हैं, और अगर इस बदलाव को दुल्हन का दूल्हा और उसका परिवार समझ लेता है तो विवाहेत्तर संबंध मधुर बने रहते हैं। तो दोस्तों, शादी का सीजन है,  नाचिए- गाइए, सजिए-संवरिए और अपने नए रिश्तो का आनंद लीजिए... आपकी दोस्त शालू वर्मा को दीजिए इजाजत, आज के अंक में बस इतना ही, अगले अंक में नए विषय के साथ आप से फिर मुलाकात होगी, नमस्कार।।...और हां, आपको मेरा यह आलेख आपको कैसा लगा, मुझे कमेंट बॉक्स में जरूर बताऐं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मैं बेटी हूं कोई सूरज नहीं जो कोहरे की चादर में दुबक जाऊं...

नमस्कार दोस्तों, ब्लॉग वाणी में आप सभी का स्वागत है मैं हूं आपकी दोस्त शालू वर्मा। सुबह हो चुकी है उठ जाइए। वैसे तो सूरज भी अभी कोहरे की चादर में दुबका हुआ है। पुरुष है ना, देर से उठेगा, आप सब की तरह। देखो ना, यह धरती सुबह 4: 00 बजे से जाग चुकी है। स्त्री है ना, जागना पड़ता है। हम सब स्त्रियों की तरह। दोस्तों, पुरुषों की तरह हमें कोई आवाज देकर नहीं उठाता। ...और ना ही हमें कोई अलार्म लगाना पड़ता है। हमें आवाज देती है ' ममता '। वो  ममता, जो हमारे पशुओं से जुड़ी है। वह ममता, जो हमारे अपने बच्चों से जुड़ी है। वह ममता, जो घर के रिश्तों व परिवार से जुड़ी है। आधे से ज्यादा भारत में हमारी बहनें यानी स्त्रियां महज इसलिए सुबह 4: 00 बजे उठ जाती हैं कि उन्हें अपने पशुओं- गाय ,भैंस, बकरी इत्यादि को चारा डालना होता है, पानी पिलाना होता है, उनका दूध निकालना होता है। फिर चाहे यह मौसम सर्दी, गर्मी, बरसात, कैसा भी क्यों ना हो। ... और दोस्तों, गांव- ढाणियों या फिर जिन घरों में पशु हों वही स्त्रियां जल्दी उठती हैं, ऐसा नहीं है। कस्बों और बड़े शहरों में भी स्त्रियों को तो जल्दी उठना ही पड़त

गर्व करो ऐ भारतवासी अब अपना भी संविधान है...

नमस्कार दोस्तों, काव्य मंच में आप सभी का स्वागत है। मैं हूं आपकी दोस्त, शालू वर्मा। आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। आज बेटे हिरेन्द्र ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर काव्य लेखन किया और बहुत ही सुंदर ढंग से काव्य पाठ किया प्रस्तुत है उसी के अंश... आओ दोस्तों, तुम्हें सुनाऊं कहानी हिंदुस्तान की,  कैसे मिली आजादी हमको, कैसे रचना हुई संविधान की, सन 47 से पहले विधान अंग्रेजों का ही चलता था, रोटी, कपड़ा और मकान मांगने पर चाबुक उनका चलता था, सत्याग्रह बापू का देख, अंग्रेजों का सिंहासन डोला उठा, लाठीचार्ज हुआ लाला पर,  तो आजाद, भगत सिंह का खून खौल उठा, वीर सपूतों की कुर्बानी ने आजादी की अलख जगाई थी, तब जाकर सन 47 में हमने अपनी आजादी पाई थी, इस धरा का इस धरती का जैसे एक विधान है, गर्व करो ऐ भारतवासी अब  अपना भी एक संविधान है, बाबा साहेब अंबेडकर ने  दुनिया के संविधानों को खंगाला, और 2 साल 11 महीने 18 दिन में संविधान बना डाला, आओ दोस्तों तुम्हें सुनाऊं कहानी हिंदुस्तान की कैसे मिली आजादी हम को  कैसे रचना हुई संविधान की...

कृपया फोलो/ Follow करें।

कुल पेज दृश्य